Saturday, 18 May 2013

SantMehi: Welcome

SantMehi: Welcome: Welcome to Maharshi Mehi Ashram Kuppaghat Bhagalpur (May 2013)

17 comments:

  1. satsang nit aru dhyan nit rahiye karat sanlagna ho vyabhichar chori nasha hinsa jhuth tajna chahiye [Maharshi Mehi]

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  2. श्रुति ठहरानी रहे अकाशा, तिल खिरकी में निस दिन वसा ।
    गगन द्वार दीशे एक तारा, अनहद नाद सुने झनकारा ॥ [GHAT RAMAYAN--BY -SANT TULSI ]
    Sant Tulsi Says:-In meditation--
    A devotee stay within inner sky at a place that is as small as a sesame[til] seed. It is a window to look within . Here he stays day and night (all the times) then he seas there a shineing star. It is the door of inner sky, than he hears the uncountable ringing sound with sweet meloday{. This is the experience of a devotee when he goes within ,--MedItation is a mean by which the capacity of a man increases .Maditation gives human all round devlopement .But it is based on Good Character.

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  3. ताते सेइये यदुराई
    सम्पत्ति विपत्ति विपत्ति सो सम्पति ,देह धरे को इहे सुभाई । ।
    तरुवर फुले फले परिहरे अपने कालहि पाई ।
    सरवर नीर भरे पुनि उमडे ,सूखे खेह उराई ।।
    द्वितीय चन्द्र बाढ़त ही बाढ़े ,घटत घटत घटि जाई ।
    सूरदास संपदा आपदा जनि कोई पतियाई ॥ [संत सूरदास ]
    अर्थ --[meaning]---The cause to worship Lord Krishna is like this ---
    Prosperity and distresscomes in one's life for a moment and then it passes away.It is the nature of a living beings who is with body.A tree is filled with flowesr fruits at some times. But after that it is without it at other time. Like wise a river flows over. It break its bank. But a day comes when it dries to sand. The new moon grows to a full moon. But after some days decreasing gradualy. It is light-less.Similary welth and distes comes in life for a moment and then passes awey. No one should belive it. Hence knowing this reality every one most worship. All mighty Lord God Krishana
    है मानव का कर्तव्य यही -मन को निज बंधू बनाकर के
    ये कर उसे सहाय्य आतम -उद्धार करे,
    अविरल आत्मा-जागरण करे,
    निचे न गिरे।
    "यह मन विचित्र
    यह आत्मा का है, परम शत्रु,
    है परम मित्र-
    यह बंधू उसी का जिसे इसको लिया जीत
    अन्यथा यही तो परम शत्रु, निष्ठुर, अभीत।
    { गीता अध्याय-६} गीता काव्यानुवाद-इंदु शेखर

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  5. satsang nit aru dhyan nit rahiye karat sanlagna ho vyabhichar chori nasha hinsa jhuth tajna chahiye [Maharshi Mehi]

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  6. दुबकी मरी समुद में निकसा जाय अकाश।
    गगन मंडल में घर किया हिरा पाया दस ॥
    (Sant Kabir Sakhi)... Mean- Sant Kabir says-devotee sank in the sea. (human body) such that went through the sky. There he made a home in void and found precious diamond (Inner light)
    Central idea-Human body is a piculiar sea. A devotee under goes
    to the inner sky where he sank within his body according to a real preceptor. He stayed there firmly in void. There he found a lighted point and devine light. Thus he found the goal of his life.

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  7. सुख नहीं पार्थ , ये केवल दुःख-
    क्षण-मात्र भान देते सुख का,
    फिर कारन बन जाते दुःख का।
    बुधजअन न रमण करते इसमें,
    अमृत मिलता न कभी बिष में।"
    Gita Adhaya five----
    The pleasures which are born of sence-contacts are verily sources of pain (Though appering as enjoyable to worldly-minded people). They have a beginning and an end (They come and go). Arguna, it is for this reason that a wise man does not indulge in them.

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  8. मेरी आँखों में तारा नजर आवे ॥
    आंखि मुंदी के गगन निहारो ,सुन्दर दामिनी दमकि आवे ।
    गगन बाट में बिजली चमके ,देखि देखि मन को भावे ॥
    शीतल चंदा खील रहा है ,मोहन रूप से तरसावे ॥
    देवी साहब की ध्यानानंद पर ,कृपा अधिक सब लाखवावे॥
    [सत्संग योग --महर्षि मेही ]

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  9. मेरी आँखों में तारा नजर आवे ॥
    आंखि मुंदी के गगन निहारो ,सुन्दर दामिनी दमकि आवे ।
    गगन बाट में बिजली चमके ,देखि देखि मन को भावे ॥
    शीतल चंदा खील रहा है ,मोहन रूप से तरसावे ॥
    देवी साहब की ध्यानानंद पर ,कृपा अधिक सब लाखवावे॥
    [सत्संग योग --महर्षि मेही ]

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  10. सुख नहीं पार्थ , ये केवल दुःख-
    क्षण-मात्र भान देते सुख का,
    फिर कारन बन जाते दुःख का।
    बुधजअन न रमण करते इसमें,
    अमृत मिलता न कभी बिष में।"
    Gita Adhaya five----
    The pleasures which are born of sence-contacts are verily sources of pain (Though appering as enjoyable to worldly-minded people). They have a beginning and an end (They come and go). Arguna, it is for this reason that a wise man does not indulge in them.

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  11. संत दरिया साहब मारवारी -----
    दरिया त्रिकुटी संध में ,मन ध्यान धरे कर धीर ।
    अवस चालत है सुषमना ,चालत प्रेम की सीर ॥
    सूरत गगन में बैठ कर ,पति का ध्यान संजोय।
    नाड़ी नाड़ी रूं रूं विषे ,ररंकार धुन होय ॥
    अर्थ-- संत दरिया साहब कहते है कि इड़ा ,पिगला और सुषमना नाड़ी के मिलन स्थान पर मजबूती और धैर्य के साथ ठहराने वाला जानता है कि सुषमना से होकर प्रेम की धारा [चेतना ]का प्रवाह होता है ख्याल [सुरत ]जब शुन्य में प्रभु का ध्यान लगन और धीरज के साथ करता है तो शरीर के प्रत्येक अंग से ररंकार [अनहद ]की आवाज होती है

    IN english--central idea---
    If a person [soul]stays at void [dimentionless state] firmly with devotion he goes within and have him devine sound.

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  12. साहिब से सतगुरु भये ,सतगुरु से भये साध ।ये तीनो अंग एक है गति कछु अगम अगाध ।। [संत गरीब दास जी]
    साध मिले साहब मिले ,अंतर रहा न रेख ,।मनसा वाचा कर्मणा साहब साधू एक । । [संत कबीर दास जी ]
    संत भगवंत अंतर निरंतर नहीं किमपि ,,मति विमल कह दास तुलसी ॥ [संत तुलसी दास जी]
    Mean--The supreme came in the form ofSpritual preceptor [satguru],again that came in the form of saint..All these three are identical and are beyond the comman thought.
    2---If the sani has been found,it is as if the Supreme has been found--there is no distinction between the two.Sant is like the Supreme Himself by mind speach and action..
    3---Sant tulsi das says there is no distinction between the real Sant and Supreme .It is the preaching of aman of pure heart.

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  13. खेलो री हिरदे हरि होरी ,पल में पल सुरति बहोरि ॥
    उनमुनि संग पवन पिचकारी ,सुखमनी मार मचोरी ।
    बैंकनाल रंग माट भरो है ,पिय पर ले छिड़कोरी ,
    आज ऐसो मेल मिलो री||1||
    [संत तुलसी साहब ]

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  14. कौन विभूति यहाँ सुस्थिर है ,अति क्षण -भंगुर यह यौवन ।
    काल -दन्त के बिच फसा है ,ग्रास -सदृश मानव -जीवन ।
    फिर भी यह परलोक- साधना ,का न ध्यान करनेवाला ।
    हाय!मनुज रे, तू सचमुच है ,अति बिस्मित करने वाला ॥९८॥
    भूमण्डल भी भस्मित होता औ' सुमेरु होता खंडित ।
    महा समुद्र सूख जाता है ,होकर निज जल से विरहित ,।
    तो इस तन का क्या कहना फिर ?इसकी कौन बिसात यहाँ ।
    बड़े बड़ों की बात नहीं कुछ फिर इसकी तो बात कहाँ||100||
    [वैराग्य शतक --भर्तृहरि कृत ]
    Meaning--yogi-Raja Bhartrihari states which is the worthy and powerful person to live here forever.this pleasent period of youth is also for amomentand expire soon This human-life is like a piece of bread among the cruel mouth and sharp teeth of time [period].But a person does not devote God for his good future after this material world even in this surcomestances.It is a matter of great surprise. O'Man think sincerly.||97||
    This glorious Earth also turns into ash.The greatest mountain named Sumeru also turns into pieces.The greatest vast sea dries having no water in it .Then what to say of this perishable human body ?What is its strength?Manymighty persons have gone empty from here then what to say of rest others.
    [vairagya shatak by yogi Raja Bhartrihari ]

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  15. साधो यह मन गह्यो न जाई
    चंचल तृष्णा संग बसत है , चाटे मन न थिराई
    कठिन क्रोध घट ही के भीतर , या विधि साब विसराई ॥
    रजत ज्ञान सबको हर लीन्हा , ताते कुछ न बसाई ॥
    जोगी जगत करत सब हारै , गुनी रहे गुन गायी ॥
    जब नानक गुरु भये दलाल , तो सब बिधि बनि आई ॥

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  16. छन मे छटपट सब निकसत है ,जब जम छेके आइ ।
    छटपट करिहौ जम ज्वाला से ,तब कहु कौन सहाई ॥
    जम का मुगदर ऊपर बरसे ,तब को करे उबारी ॥
    तात मात भ्राता सुत सज्जन ,काम न आवे नारी ॥

    छुट्यो सर्व सगाई ,भैया चोर का हाल ।
    संगी सब न्यारे भये ,आप गये मुख काल ॥
    [संत कबीर]

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